शिक्षा नीति

निजी स्कूल शिक्षकों के लिए एक समान वेतन-पेंशन की मांग: सुप्रीम कोर्ट का केंद्र-राज्यों को नोटिस

 

भारत में करीब 37 लाख शिक्षक मान्यता-प्राप्त निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, लेकिन उनका वेतन, पेंशन और सेवानिवृत्ति के बाद का लाभ किसी एक राष्ट्रीय नियम से नहीं, बल्कि राज्य के कानून, स्कूल की नीति और संस्थान की इच्छा से तय होता है। क्या यह अंतर संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत शिक्षकों की सार्वजनिक भूमिका के अनुरूप है? सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यही सवाल है — और अदालत ने गुरुवार को केंद्र व राज्य सरकारों से चार हफ्ते में जवाब मांगकर इस बहस को औपचारिक रूप दे दिया है।

कोर्ट में क्या हुआ

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) को नोटिस जारी किया। संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है, और मामले की अगली सुनवाई उसी अवधि के बाद तय है। यह याचिका ऑल-इंडिया टीचर्स फेडरेशन की नेशनल कोऑर्डिनेटर लिगीमोल जॉर्ज ने वकील दीपक प्रकाश के माध्यम से दाखिल की है। [स्रोत: लाइव हिन्दुस्तान रिपोर्ट]

याचिका की तीन मांगें

याचिका में केंद्र सरकार से एक तय समय-सीमा के भीतर निजी स्कूल शिक्षकों के लिए व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाने पर विचार करने को कहा गया है। इसमें तीन ठोस मांगें हैं — एक नेशनल प्राइवेट स्कूल टीचर्स वेलफेयर बोर्ड का गठन, सेवानिवृत्ति पर पेंशन की गारंटी, और चिकित्सा सहायता, बीमा तथा परिवार के लिए लाभ सुनिश्चित करने वाला एक सरकारी तंत्र।

तर्क का संवैधानिक आधार

याचिकाकर्ता का कहना है कि निजी स्कूल शिक्षक अनुच्छेद 21ए के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के संवैधानिक दायित्व को आगे बढ़ाने का सार्वजनिक काम करते हैं, लेकिन उनके लिए कोई एक समान कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है — नतीजा यह कि एक ही रैंक के शिक्षकों को राज्य और संस्थान के हिसाब से अलग-अलग लाभ मिलते हैं। याचिका में अनुच्छेद 21 के साथ-साथ अनुच्छेद 38, 39, 41, 42 और 43 का हवाला दिया गया है, और निजी स्कूल शिक्षकों की तुलना भवन-निर्माण श्रमिकों, बीड़ी श्रमिकों, सिनेमा श्रमिकों, मछुआरों, पत्रकारों और असंगठित क्षेत्र के अन्य श्रमिकों से की गई है, जिनके लिए कल्याणकारी कानून पहले से मौजूद हैं।

पैमाना कितना बड़ा है

याचिका आधिकारिक UDISE+ 2023-24 डेटा पर टिकी है। इसके अनुसार देश में करीब 14.72 लाख स्कूल, 98 लाख से अधिक शिक्षक और लगभग 24.8 करोड़ छात्र हैं। इनमें से 37,30,047 शिक्षक मान्यता-प्राप्त निजी स्कूलों में कार्यरत हैं — यानी हर तीन में से करीब एक शिक्षक निजी स्कूल में पढ़ा रहा है।

14.72 लाख

कुल स्कूल

98 लाख+

कुल शिक्षक

37,30,047

निजी स्कूल शिक्षक

आंकड़े: UDISE+ 2023-24, याचिका में उद्धृत

अभी क्या तय नहीं हुआ

अदालत ने अभी सिर्फ नोटिस जारी किया है — न कोई अंतरिम राहत दी है, न राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश। केंद्र और राज्य सरकारों का जवाब अभी रिकॉर्ड पर नहीं आया है, इसलिए यह भी स्पष्ट नहीं कि सरकारें इस मांग का समर्थन करेंगी या विरोध — निजी स्कूल शिक्षकों को वेतन-समानता के दायरे में लाने के पुराने प्रस्तावों पर केंद्र सरकार पहले विरोध की स्थिति में भी रह चुकी है। मामला अभी सुनवाई के शुरुआती चरण में है, और अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय है।

निष्कर्ष: अभी क्या स्पष्ट नहीं

 कोर्ट के सामने रखे आंकड़े यह स्थापित करते हैं कि निजी स्कूल शिक्षकों का दायरा बड़ा है — देश के हर तीन शिक्षकों में एक — और उनके वेतन-पेंशन तय करने वाला कोई एक राष्ट्रीय ढांचा अभी मौजूद नहीं है।